Everyone says so -
"Keep moving
Till the last breath."
Oh oh...
My heart does not agree any more.
Why I should not stop moving ahead !
Now... right here.
I just do not feel like
Keep moving any more.
It's been enough
Living life like this.
Enough of these daily struggles
Running around
Enough of handling
Thirsts that never get quenched.
Now, I only want to
Look around and drink
The beauty of life as it is.
Now, I only want to
Inhale the life
Deep inside me as I breathe.
I just want to hear
My own breaths
In the stillness of life around me
Right now... here.
April 02, 1994
Wonders of an enchanting journey called life... (Select English or Hindi from the categories on the right column to read posts in a language of your choice)
Sunday, June 17, 2007
Monday, June 11, 2007
A Strange Preparation
In this world of mine
Everyday
When
I get up
In the morning
I see that
All the people around me
Are busy
In a strange preparation
To
Create as much noise as possible
So as to
Fill the emptiness of their minds
And to
Get rid of
Loneliness.
But alas!
I do not know why
By evening
As the sun sets
The loneliness becomes overwhelming
And minds get drained.
And then
When I get up the next morning
I again find
That everyone
Is preparing
To fight again.
November 23, 1993
Everyday
When
I get up
In the morning
I see that
All the people around me
Are busy
In a strange preparation
To
Create as much noise as possible
So as to
Fill the emptiness of their minds
And to
Get rid of
Loneliness.
But alas!
I do not know why
By evening
As the sun sets
The loneliness becomes overwhelming
And minds get drained.
And then
When I get up the next morning
I again find
That everyone
Is preparing
To fight again.
November 23, 1993
Loss
Some went away
Some turned adversaries
And some played strangers
Keeping silent.
I just do not know what I did
That I lost all !
September 24, 1993
Some turned adversaries
And some played strangers
Keeping silent.
I just do not know what I did
That I lost all !
September 24, 1993
Sunday, June 10, 2007
Time
वक़्त तू क्यों इतना विरोधी है ?
करता है सांठ गाँठ हवा के हर झोंके से
कि बन थपेड़ा वह मुझे चोट पहुँचाये ।
जिन्दगी के हर मोड़ पर
तू मुझे कठिन राहें दिखाए
वक़्त तू क्यों इतना विरोधी है ?
August 08, 1993
करता है सांठ गाँठ हवा के हर झोंके से
कि बन थपेड़ा वह मुझे चोट पहुँचाये ।
जिन्दगी के हर मोड़ पर
तू मुझे कठिन राहें दिखाए
वक़्त तू क्यों इतना विरोधी है ?
August 08, 1993
Wait
वो काफिले सजाते रहे
और हम करते रहे इन्तजार
पर अफ़सोस - वक़्त को न थी किसी की परवाह
वो तो दूरियां और बढ़ा गया ।
March 05, 1993
और हम करते रहे इन्तजार
पर अफ़सोस - वक़्त को न थी किसी की परवाह
वो तो दूरियां और बढ़ा गया ।
March 05, 1993
O Destiny !
पथराई आँखें - शून्य तकतीं
मन में अबुझ प्यास
सूखे ओंठ
ये तेज हवाएं
लड़खड़ाते कदम
अनजान राहें
अनजान चेहरे
पराए से
नियति ! मैंने ऐसा क्या बिगाड़ा था ?
जो इस मोड़ पर ले आयी !
March 04, 1993
मन में अबुझ प्यास
सूखे ओंठ
ये तेज हवाएं
लड़खड़ाते कदम
अनजान राहें
अनजान चेहरे
पराए से
नियति ! मैंने ऐसा क्या बिगाड़ा था ?
जो इस मोड़ पर ले आयी !
March 04, 1993
Thursday, June 07, 2007
The Owl on Banyan Tree
उस रात
गहरे अँधेरे में
सन्नाटे को अचानक तोड़कर
चीखने के बाद
बरगद पर बैठने वाला उल्लू
चुपचाप आंखें बंद कर बैठा है ।
कहते हैं
कि उस रात
उसने जो भी देखा
वह बहुत ही भयावह था ।
एक आदमी
दबे क़दमों से पेड़ के नीचे आया
अपने हाथों से उसने
अपना चेहरा उतारा
फिर सिर ऊपर कर
आसमान की ओर देखा ।
और बस
तभी बरगद पर बैठने वाला
उल्लू चीख पड़ा
और उसने अपनी आँखें बंद कर लीं ।
Monday, June 04, 2007
The Suicide Note of a Bad Man
तुमने कभी नहीं मानी मेरी बात ।
मैंनें तुमसे कहा था कि
कह दो इन लोगों से - हंसना छोड़ने को
पर तुमने तो रोते हुए लोगों को भी
हँसाने की योजनायें बनाईं ।
मैंनें कहा कि
तुम इन हवाओं को इतना मंद - मंद बहने से रोको
और कहो इनसे धूल उड़ाने को
जो लोगों की आंखों में भर जाये ।
पर आश्चर्य
तुमने तो आँधियों को भी
समझा बुझा कर
धीमे धीमे बहने को कहा ।
और मैंने चाहा था कि
तुम नदियों से कहो कि
वे बादलों की सहायता लें
और उफ़न कर तबाही मचायें ।
तब तुमने एक बार फिर
मेरी न मानी
और ज्यादा बादलों को
सूखे वाले इलाकों में भेज दिया ।
मैंने बच्चों की मासूमियत छीननी चाही
फूलों की खुशबु छीननी चाही
इंसानी रिश्तों को ख़त्म करना चाहा
धरती को बाँटना चाहा ।
और भी न जाने क्या क्या
अरमान थे मेरे
पर अफसोस
तुमने मेरा कभी भी साथ न दिया ।
इसलिये ऐ मेरी जिंदगी
में आज
तेरी सारी अच्छाई के साथ
तेरी ह्त्या कर रहा हूँ ।
composed on : April 08, 1993
मैंनें तुमसे कहा था कि
कह दो इन लोगों से - हंसना छोड़ने को
पर तुमने तो रोते हुए लोगों को भी
हँसाने की योजनायें बनाईं ।
मैंनें कहा कि
तुम इन हवाओं को इतना मंद - मंद बहने से रोको
और कहो इनसे धूल उड़ाने को
जो लोगों की आंखों में भर जाये ।
पर आश्चर्य
तुमने तो आँधियों को भी
समझा बुझा कर
धीमे धीमे बहने को कहा ।
और मैंने चाहा था कि
तुम नदियों से कहो कि
वे बादलों की सहायता लें
और उफ़न कर तबाही मचायें ।
तब तुमने एक बार फिर
मेरी न मानी
और ज्यादा बादलों को
सूखे वाले इलाकों में भेज दिया ।
मैंने बच्चों की मासूमियत छीननी चाही
फूलों की खुशबु छीननी चाही
इंसानी रिश्तों को ख़त्म करना चाहा
धरती को बाँटना चाहा ।
और भी न जाने क्या क्या
अरमान थे मेरे
पर अफसोस
तुमने मेरा कभी भी साथ न दिया ।
इसलिये ऐ मेरी जिंदगी
में आज
तेरी सारी अच्छाई के साथ
तेरी ह्त्या कर रहा हूँ ।
composed on : April 08, 1993
Wednesday, May 23, 2007
Realisation
Our seemigly individual existences have a connecting thread !
Explore that connection and you might stumble upon a life shaking experience...the Lord of the Universe manifests in a variety of forms and one of them starts exploring the Self and comes across the Self itself on the road built by Himself.
Explore that connection and you might stumble upon a life shaking experience...the Lord of the Universe manifests in a variety of forms and one of them starts exploring the Self and comes across the Self itself on the road built by Himself.
Monday, May 21, 2007
O Ganges !
Composed on Nov 22, 1989
------------------------------
ओ गंगा ! तू जो कि रही है साक्षी
फैली हुई अनगिन समय धाराओं की
करती रही है विदा बूढी़ होती सदियाँ
बता, मैं तेरे तटों पर कुछ पूछने आया हूँ ।
तेरी चपल धारा - श्वेत वस्त्र सी धरा पर
तूने तो सुना होगा राम का नाम और कृष्ण का गान
तूने देखा भी होगा बुद्ध का दैदीप्यमान मुखमंडल
और सुना समेटा होगा निर्झर जो झरा मुख से ।
बता गंगे ! कैसा था ऋचाओं का नाद
यज्ञ कुण्ड की अग्नि जब धधकती थी तटों पर
क्या करते थे होम ऋषिगण
कैसा था पवन का वेग और कैसा था सूर्य का ताप ?
बता जब तेरे तटों के इस ओर से उस ओर
उतरतीं थीं सेनाएँ - होता था शंखनाद
गुजरते थे विजयी सम्राट करते उदघोष
क्या लक्ष्य लिए जाते थे सेनानी ?
नानक की वाणी और सूफी संदेश गुजरे थे तेरे तटों से
कबीर कह गए सब सार जो था तत्त्व का; सादगी से
सूरदास और तुलसी गुनगुना गए भाक्ति भाव से
तेरे ही तटों पर नहा गए ईसा के प्यारे ।
गंगे ! क्या अब भी झरते हैं निर्झर
तेरे तटों पर क्या अब भी पवित्रता बसती है
बोल क्या पीड़ित आत्मायें नहीं आतीं
लिए चीत्कारें दूर निर्जनों में मिटाने को अग्नि ?
बता तू जो कि है कथा सार इस विस्तृत भूखंड की
हिमवान से सागर तटों तक करते नमन जन
न बह चुपचाप कर गर्जन बन विशाल
तू भी तो ऋणी है इस धरा की ।
गंगे न बनके चल तू शव वाहिनी
तू सूना वे ऋचाएं रखीं तूने जो संजो
तू बहा निर्झर बुद्ध के स्वरों का
और सुना वे गीत करें जो रोमांच पैदा ।
देख सब देख रहे हैं तेरे तटों को
तू पावन सूना वे अमर गाथाएँ
कैसे बाँटता था बन मेघ हर्ष निधि अपनी
सुन सिंघनाद वीरों का भारती मुस्काती थी कैसे ।
बता कैसा था रंग बलिदानियों के रक्त का
कैसा था आमंत्रण मृत्यु को अमर सेनानी का
बता गंगे तेरे तटों पर क्या शपथें लेते थे वीर
क्या गुनगुनाते हुए वे प्रयाण कर जाते थे ?
गंगे बता इन जनों को
चेतनता तरंगित करती है कैसे
कैसे जागृति के प्रकाश तले
खड़े करतीं हैं सभ्यताएँ विजय स्तम्भ नए ।
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ओ गंगा ! तू जो कि रही है साक्षी
फैली हुई अनगिन समय धाराओं की
करती रही है विदा बूढी़ होती सदियाँ
बता, मैं तेरे तटों पर कुछ पूछने आया हूँ ।
तेरी चपल धारा - श्वेत वस्त्र सी धरा पर
तूने तो सुना होगा राम का नाम और कृष्ण का गान
तूने देखा भी होगा बुद्ध का दैदीप्यमान मुखमंडल
और सुना समेटा होगा निर्झर जो झरा मुख से ।
बता गंगे ! कैसा था ऋचाओं का नाद
यज्ञ कुण्ड की अग्नि जब धधकती थी तटों पर
क्या करते थे होम ऋषिगण
कैसा था पवन का वेग और कैसा था सूर्य का ताप ?
बता जब तेरे तटों के इस ओर से उस ओर
उतरतीं थीं सेनाएँ - होता था शंखनाद
गुजरते थे विजयी सम्राट करते उदघोष
क्या लक्ष्य लिए जाते थे सेनानी ?
नानक की वाणी और सूफी संदेश गुजरे थे तेरे तटों से
कबीर कह गए सब सार जो था तत्त्व का; सादगी से
सूरदास और तुलसी गुनगुना गए भाक्ति भाव से
तेरे ही तटों पर नहा गए ईसा के प्यारे ।
गंगे ! क्या अब भी झरते हैं निर्झर
तेरे तटों पर क्या अब भी पवित्रता बसती है
बोल क्या पीड़ित आत्मायें नहीं आतीं
लिए चीत्कारें दूर निर्जनों में मिटाने को अग्नि ?
बता तू जो कि है कथा सार इस विस्तृत भूखंड की
हिमवान से सागर तटों तक करते नमन जन
न बह चुपचाप कर गर्जन बन विशाल
तू भी तो ऋणी है इस धरा की ।
गंगे न बनके चल तू शव वाहिनी
तू सूना वे ऋचाएं रखीं तूने जो संजो
तू बहा निर्झर बुद्ध के स्वरों का
और सुना वे गीत करें जो रोमांच पैदा ।
देख सब देख रहे हैं तेरे तटों को
तू पावन सूना वे अमर गाथाएँ
कैसे बाँटता था बन मेघ हर्ष निधि अपनी
सुन सिंघनाद वीरों का भारती मुस्काती थी कैसे ।
बता कैसा था रंग बलिदानियों के रक्त का
कैसा था आमंत्रण मृत्यु को अमर सेनानी का
बता गंगे तेरे तटों पर क्या शपथें लेते थे वीर
क्या गुनगुनाते हुए वे प्रयाण कर जाते थे ?
गंगे बता इन जनों को
चेतनता तरंगित करती है कैसे
कैसे जागृति के प्रकाश तले
खड़े करतीं हैं सभ्यताएँ विजय स्तम्भ नए ।
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