तुमने कभी नहीं मानी मेरी बात ।
मैंनें तुमसे कहा था कि
कह दो इन लोगों से - हंसना छोड़ने को
पर तुमने तो रोते हुए लोगों को भी
हँसाने की योजनायें बनाईं ।
मैंनें कहा कि
तुम इन हवाओं को इतना मंद - मंद बहने से रोको
और कहो इनसे धूल उड़ाने को
जो लोगों की आंखों में भर जाये ।
पर आश्चर्य
तुमने तो आँधियों को भी
समझा बुझा कर
धीमे धीमे बहने को कहा ।
और मैंने चाहा था कि
तुम नदियों से कहो कि
वे बादलों की सहायता लें
और उफ़न कर तबाही मचायें ।
तब तुमने एक बार फिर
मेरी न मानी
और ज्यादा बादलों को
सूखे वाले इलाकों में भेज दिया ।
मैंने बच्चों की मासूमियत छीननी चाही
फूलों की खुशबु छीननी चाही
इंसानी रिश्तों को ख़त्म करना चाहा
धरती को बाँटना चाहा ।
और भी न जाने क्या क्या
अरमान थे मेरे
पर अफसोस
तुमने मेरा कभी भी साथ न दिया ।
इसलिये ऐ मेरी जिंदगी
में आज
तेरी सारी अच्छाई के साथ
तेरी ह्त्या कर रहा हूँ ।
composed on : April 08, 1993
Wonders of an enchanting journey called life... (Select English or Hindi from the categories on the right column to read posts in a language of your choice)
Monday, June 04, 2007
Wednesday, May 23, 2007
Realisation
Our seemigly individual existences have a connecting thread !
Explore that connection and you might stumble upon a life shaking experience...the Lord of the Universe manifests in a variety of forms and one of them starts exploring the Self and comes across the Self itself on the road built by Himself.
Explore that connection and you might stumble upon a life shaking experience...the Lord of the Universe manifests in a variety of forms and one of them starts exploring the Self and comes across the Self itself on the road built by Himself.
Monday, May 21, 2007
O Ganges !
Composed on Nov 22, 1989
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ओ गंगा ! तू जो कि रही है साक्षी
फैली हुई अनगिन समय धाराओं की
करती रही है विदा बूढी़ होती सदियाँ
बता, मैं तेरे तटों पर कुछ पूछने आया हूँ ।
तेरी चपल धारा - श्वेत वस्त्र सी धरा पर
तूने तो सुना होगा राम का नाम और कृष्ण का गान
तूने देखा भी होगा बुद्ध का दैदीप्यमान मुखमंडल
और सुना समेटा होगा निर्झर जो झरा मुख से ।
बता गंगे ! कैसा था ऋचाओं का नाद
यज्ञ कुण्ड की अग्नि जब धधकती थी तटों पर
क्या करते थे होम ऋषिगण
कैसा था पवन का वेग और कैसा था सूर्य का ताप ?
बता जब तेरे तटों के इस ओर से उस ओर
उतरतीं थीं सेनाएँ - होता था शंखनाद
गुजरते थे विजयी सम्राट करते उदघोष
क्या लक्ष्य लिए जाते थे सेनानी ?
नानक की वाणी और सूफी संदेश गुजरे थे तेरे तटों से
कबीर कह गए सब सार जो था तत्त्व का; सादगी से
सूरदास और तुलसी गुनगुना गए भाक्ति भाव से
तेरे ही तटों पर नहा गए ईसा के प्यारे ।
गंगे ! क्या अब भी झरते हैं निर्झर
तेरे तटों पर क्या अब भी पवित्रता बसती है
बोल क्या पीड़ित आत्मायें नहीं आतीं
लिए चीत्कारें दूर निर्जनों में मिटाने को अग्नि ?
बता तू जो कि है कथा सार इस विस्तृत भूखंड की
हिमवान से सागर तटों तक करते नमन जन
न बह चुपचाप कर गर्जन बन विशाल
तू भी तो ऋणी है इस धरा की ।
गंगे न बनके चल तू शव वाहिनी
तू सूना वे ऋचाएं रखीं तूने जो संजो
तू बहा निर्झर बुद्ध के स्वरों का
और सुना वे गीत करें जो रोमांच पैदा ।
देख सब देख रहे हैं तेरे तटों को
तू पावन सूना वे अमर गाथाएँ
कैसे बाँटता था बन मेघ हर्ष निधि अपनी
सुन सिंघनाद वीरों का भारती मुस्काती थी कैसे ।
बता कैसा था रंग बलिदानियों के रक्त का
कैसा था आमंत्रण मृत्यु को अमर सेनानी का
बता गंगे तेरे तटों पर क्या शपथें लेते थे वीर
क्या गुनगुनाते हुए वे प्रयाण कर जाते थे ?
गंगे बता इन जनों को
चेतनता तरंगित करती है कैसे
कैसे जागृति के प्रकाश तले
खड़े करतीं हैं सभ्यताएँ विजय स्तम्भ नए ।
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ओ गंगा ! तू जो कि रही है साक्षी
फैली हुई अनगिन समय धाराओं की
करती रही है विदा बूढी़ होती सदियाँ
बता, मैं तेरे तटों पर कुछ पूछने आया हूँ ।
तेरी चपल धारा - श्वेत वस्त्र सी धरा पर
तूने तो सुना होगा राम का नाम और कृष्ण का गान
तूने देखा भी होगा बुद्ध का दैदीप्यमान मुखमंडल
और सुना समेटा होगा निर्झर जो झरा मुख से ।
बता गंगे ! कैसा था ऋचाओं का नाद
यज्ञ कुण्ड की अग्नि जब धधकती थी तटों पर
क्या करते थे होम ऋषिगण
कैसा था पवन का वेग और कैसा था सूर्य का ताप ?
बता जब तेरे तटों के इस ओर से उस ओर
उतरतीं थीं सेनाएँ - होता था शंखनाद
गुजरते थे विजयी सम्राट करते उदघोष
क्या लक्ष्य लिए जाते थे सेनानी ?
नानक की वाणी और सूफी संदेश गुजरे थे तेरे तटों से
कबीर कह गए सब सार जो था तत्त्व का; सादगी से
सूरदास और तुलसी गुनगुना गए भाक्ति भाव से
तेरे ही तटों पर नहा गए ईसा के प्यारे ।
गंगे ! क्या अब भी झरते हैं निर्झर
तेरे तटों पर क्या अब भी पवित्रता बसती है
बोल क्या पीड़ित आत्मायें नहीं आतीं
लिए चीत्कारें दूर निर्जनों में मिटाने को अग्नि ?
बता तू जो कि है कथा सार इस विस्तृत भूखंड की
हिमवान से सागर तटों तक करते नमन जन
न बह चुपचाप कर गर्जन बन विशाल
तू भी तो ऋणी है इस धरा की ।
गंगे न बनके चल तू शव वाहिनी
तू सूना वे ऋचाएं रखीं तूने जो संजो
तू बहा निर्झर बुद्ध के स्वरों का
और सुना वे गीत करें जो रोमांच पैदा ।
देख सब देख रहे हैं तेरे तटों को
तू पावन सूना वे अमर गाथाएँ
कैसे बाँटता था बन मेघ हर्ष निधि अपनी
सुन सिंघनाद वीरों का भारती मुस्काती थी कैसे ।
बता कैसा था रंग बलिदानियों के रक्त का
कैसा था आमंत्रण मृत्यु को अमर सेनानी का
बता गंगे तेरे तटों पर क्या शपथें लेते थे वीर
क्या गुनगुनाते हुए वे प्रयाण कर जाते थे ?
गंगे बता इन जनों को
चेतनता तरंगित करती है कैसे
कैसे जागृति के प्रकाश तले
खड़े करतीं हैं सभ्यताएँ विजय स्तम्भ नए ।
Wednesday, May 16, 2007
Darkness
Composed on Nov 07, 1992
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मुझे घने अँधेरे में डर लगता है
इसलिये नहीं कि
इस अँधेरे में मुझे कुछ दिखायी नहीं देता
बल्कि इसलिये कि इस अँधेरे में वे देख सकते हैं ।
मैं जानता हूँ कि
जैसे जैसे इस अँधेरे की उम्र खिंचती जायेगी
उनकी आंखें और अभ्यस्त होती जाएँगी
उनके निशाने और अचूक होते जायेंगे ।
तब तो उस फकीर की बात किसी ने नहीं मानी
उसने कहा था कि
सूरज डूब जाये - जो कि डूबेगा ही - तो
ज़रा भी शोक न करना ।
बस अपने घर के दीयों को
जतन से जलाए रखना
उन्हें बुझने मत देना
उन्हें अंधा बनाने को एक दिया भी काफी है ।
और अब तुम सब बैठ कर रो रहे हो
यह अँधेरा तो पहले ही इतना भयावह है
पर मुझे तो दुःख इस बात का है कि
मुझे भी उस फकीर की बात सही लगी थी ।
और मैंने सोचा भी था
दिया जलाने के लिए
इंतजाम करने को
पर न जाने क्यों मैंने कुछ नहीं किया ।
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मुझे घने अँधेरे में डर लगता है
इसलिये नहीं कि
इस अँधेरे में मुझे कुछ दिखायी नहीं देता
बल्कि इसलिये कि इस अँधेरे में वे देख सकते हैं ।
मैं जानता हूँ कि
जैसे जैसे इस अँधेरे की उम्र खिंचती जायेगी
उनकी आंखें और अभ्यस्त होती जाएँगी
उनके निशाने और अचूक होते जायेंगे ।
तब तो उस फकीर की बात किसी ने नहीं मानी
उसने कहा था कि
सूरज डूब जाये - जो कि डूबेगा ही - तो
ज़रा भी शोक न करना ।
बस अपने घर के दीयों को
जतन से जलाए रखना
उन्हें बुझने मत देना
उन्हें अंधा बनाने को एक दिया भी काफी है ।
और अब तुम सब बैठ कर रो रहे हो
यह अँधेरा तो पहले ही इतना भयावह है
पर मुझे तो दुःख इस बात का है कि
मुझे भी उस फकीर की बात सही लगी थी ।
और मैंने सोचा भी था
दिया जलाने के लिए
इंतजाम करने को
पर न जाने क्यों मैंने कुछ नहीं किया ।
O Clouds!
Composed on Sep 04, 1992
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वर्षा के पानी की बूँदें
सरसराती ठंडी हवा
और मेरा मन -
मधुर भाव -
हाँ यही बनेगा इनसे मिलकर ।
तो बरसो
ओ मेघों ।
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वर्षा के पानी की बूँदें
सरसराती ठंडी हवा
और मेरा मन -
मधुर भाव -
हाँ यही बनेगा इनसे मिलकर ।
तो बरसो
ओ मेघों ।
Tuesday, May 15, 2007
She
Composed on Jun 14, 1991
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वह आज चुप बैठी रही
सुबह से - जब उसने दूध गर्म करने को चढाया
दूध गर्म हुआ, उफान आया, और फैल गया
वह न उठी ।
छोटा बच्चा उसके पास आया - वह भूखा था
वह न उठी ।
पति ने खाना माँगा
वह खड़ा रहा - कुछ देर - और फिर चला गया ।
बच्चा भूख से कुछ देर रोया - और फिर सो गया
सूरज धीरे धीरे आसमान में चढ़ा और ढल गया ।
पर वह यूं ही बैठी रही; चुपचाप ।
वह सोचती रही न जाने क्या
कहीँ मानो उलझ गयी ।
घर भी चुप है
दीवारें सहमी सी हैं ।
शाम हो गयी है ।
बच्चा जग गया है और माँ के पास बैठा है
पति लौट आया है
वह भी पास ही बैठा है ।
सब इंतज़ार में हैं
वह उठे और चूल्हा फिर जले
कि फिर घर बोल उठे ।
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वह आज चुप बैठी रही
सुबह से - जब उसने दूध गर्म करने को चढाया
दूध गर्म हुआ, उफान आया, और फैल गया
वह न उठी ।
छोटा बच्चा उसके पास आया - वह भूखा था
वह न उठी ।
पति ने खाना माँगा
वह खड़ा रहा - कुछ देर - और फिर चला गया ।
बच्चा भूख से कुछ देर रोया - और फिर सो गया
सूरज धीरे धीरे आसमान में चढ़ा और ढल गया ।
पर वह यूं ही बैठी रही; चुपचाप ।
वह सोचती रही न जाने क्या
कहीँ मानो उलझ गयी ।
घर भी चुप है
दीवारें सहमी सी हैं ।
शाम हो गयी है ।
बच्चा जग गया है और माँ के पास बैठा है
पति लौट आया है
वह भी पास ही बैठा है ।
सब इंतज़ार में हैं
वह उठे और चूल्हा फिर जले
कि फिर घर बोल उठे ।
Friday, May 11, 2007
Moments
Composed on Oct 22, 1994
----------------------------
अचानक
याद आ गए
बिछुड़े हुए पल
और ठहर गया मैं
राह चलते चलते।
टटोलने लगा
अपनी
पुरानी गठरी।
चारों तरफ
हो गए
इकट्ठे लोग
और पूछने लगे
कि -
यह क्या है ?
वह क्या है ?
पर मैं कुछ न बोला
और रख दीं
सारी चीजें
झाड़ पोंछ कर
वापस।
आख़िर
मुझे
आगे भी तो जाना है |
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अचानक
याद आ गए
बिछुड़े हुए पल
और ठहर गया मैं
राह चलते चलते।
टटोलने लगा
अपनी
पुरानी गठरी।
चारों तरफ
हो गए
इकट्ठे लोग
और पूछने लगे
कि -
यह क्या है ?
वह क्या है ?
पर मैं कुछ न बोला
और रख दीं
सारी चीजें
झाड़ पोंछ कर
वापस।
आख़िर
मुझे
आगे भी तो जाना है |
Thursday, May 10, 2007
Mother
Composed on Apr 29, 1994
----------------------------
माँ
दुनिया के इस कोने में
घर से बहुत दूर
मैं
अकेला हूँ
और
मुझे कुछ
कहना
है
जो
कोई नहीं सुनता।
थके हारे कदम लेकर
मैं
ढूंढता फिरता
थोड़ा सा सुकून
पर मुझे कहीँ भी
चैन नहीं आता
और मैं भटकता रहता
ले गीली आंखें।
तुम्हारे तवे की
वह गोल गोल रोटी
और वह डांट
याद आती है
हर रोज
और उठ जाता मैं
आधे पेट ही
देखता रहता
आसमान को।।
----------------------------
माँ
दुनिया के इस कोने में
घर से बहुत दूर
मैं
अकेला हूँ
और
मुझे कुछ
कहना
है
जो
कोई नहीं सुनता।
थके हारे कदम लेकर
मैं
ढूंढता फिरता
थोड़ा सा सुकून
पर मुझे कहीँ भी
चैन नहीं आता
और मैं भटकता रहता
ले गीली आंखें।
तुम्हारे तवे की
वह गोल गोल रोटी
और वह डांट
याद आती है
हर रोज
और उठ जाता मैं
आधे पेट ही
देखता रहता
आसमान को।।
River
Composed on Jun 20, 1990
----------------------------
जाओ छोड़ो भी
अब न सुनुँगा मैं कुछ भी
क्यों पिछली बारिश में तुमने
मेरी सीमाओं को तोड़ा था ...?
चंचल हो पर इसका यह मतलब तो नहीं
कि छोड़ दो तुम तटिनी कहलाना
मेघों को धरा से ही देखो
इस बार फिर भटक ना जाना।
ये बारिश है ही ऎसी
रोक न पाती मैं खुद को
जीवन का रस सुमधुर
हे तट मैं क्या करूं!
मैं नदी - प्यास बुझाती
पर फिर भी मैं जल की प्यासी
मत रूठो; लौट तो आती हूँ
इस बार दूर न जाऊंगी ॥
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जाओ छोड़ो भी
अब न सुनुँगा मैं कुछ भी
क्यों पिछली बारिश में तुमने
मेरी सीमाओं को तोड़ा था ...?
चंचल हो पर इसका यह मतलब तो नहीं
कि छोड़ दो तुम तटिनी कहलाना
मेघों को धरा से ही देखो
इस बार फिर भटक ना जाना।
ये बारिश है ही ऎसी
रोक न पाती मैं खुद को
जीवन का रस सुमधुर
हे तट मैं क्या करूं!
मैं नदी - प्यास बुझाती
पर फिर भी मैं जल की प्यासी
मत रूठो; लौट तो आती हूँ
इस बार दूर न जाऊंगी ॥
Love
Love does not stop. Love does not agree. It does not listen, it only says "I love you." And then it glows in the eyes and flows from the lips...let the love spread!
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